Subhash Chandra Bose Hindi Essay Writing

स्वतंत्रता अभियान के एक और महान क्रान्तिकारियो में सुभाष चंद्र बोस – Netaji Subhash Chandra Bose का नाम भी आता है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रिय सेना का निर्माण किया था। जो विशेषतः “आजाद हिन्द फ़ौज़” के नाम से प्रसिद्ध थी। सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद को बहुत मानते थे।

“तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा” सुभाष चंद्र बोस का ये प्रसिद्ध नारा था। उन्होंने अपने स्वतंत्रता अभियान में बहोत से प्रेरणादायक भाषण दिये और भारत के लोगो को आज़ादी के लिये संघर्ष करने की प्रेरणा दी।

सुभाषचंद्र बोस की जीवनी / About Netaji Subhash Chandra Bose In Hindi

पूरा नाम  – सुभाषचंद्र जानकीनाथ बोस
जन्म       – 23 जनवरी 1897
जन्मस्थान – कटक (ओरिसा)
पिता       – जानकीनाथ
माता       – प्रभावती देवी
शिक्षा      – 1919 में बी.ए. 1920 में आय.सी.एस. परिक्षा उत्तीर्ण।

सुभास चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे। जिनकी निडर देशभक्ति ने उन्हें देश का हीरो बनाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था।

बाद में सम्माननीय नेताजी ने पहले जर्मनी की सहायता लेते हुए जर्मन में ही विशेष भारतीय सैनिक कार्यालय की स्थापना बर्लिन में 1942 के प्रारम्भ में की, जिसका 1990 में भी उपयोग किया गया था।

शुरू में 1920 के अंत ने बीसे राष्ट्रिय युवा कांग्रेस के उग्र नेता थे एवं 1938 और 1939 को वे भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के अध्यक्ष बने। लेकिन बाद में कुछ समय बाद ही 1939 में उन्हें महात्मा गांधी / Mahatma Gandhi से चल से विवाद के कारण अपने पद को छोडना पड़ा।

लेकिन 1940 में भारत छोड़ने से पहले ही उन्हें ब्रिटिश ने अपने गिरफ्त में कर लिया था। अप्रैल 1941 को बोस को जर्मनी लाया गया।

जहा उन्हें भारतीय स्वतंत्रता अभियान की बागडोर संभाली, और भारत को आजादी दिलाने के लिये लोगो को एकजुट करने लगे और एकता के सूत्र में बांधने लगे।

नवंबर 1941 में, जर्मन पैसो से ही उन्होंने बर्लिन में इंडिया सेंटर की स्थापना की और कुछ ही दिनों बाद फ्री इंडिया रेडियो की भी स्थापना की, जिसपर रोज़ रात को बोस अपना कार्यक्रम किया करते। तक़रीबन 3000 मजबुत स्वयं सेवी सैनिको ने इरविन रोमेल्स द्वारा हथियाए अफ्रीका कॉर्प्स को अपने कब्जे में किया।

बाद में सुभाषचंद्र बोस को जर्मन से बहोत सहायता मिली और उन्होंने भारत की खोज के लिये जर्मन जमीन का भी उपयोग किया। इसी दौरान बोस पिता भी बने, उनकी पत्नी और सहयोगी एमिली स्किनल, जिनसे वे 1934 में मिले थे। उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया।

1942 की बसंत से, जापानियों ने दक्षिणी एशिया को हथिया लिया था और वे जर्मन प्राथमिकताओं को बदलने लगे थे। बाद में भारत पर हुआ जर्मन हमला असहनीय बनता गया।

इसे देखते हुए सुभाषचंद्र बोस ने दक्षिणी एशिया जाने का निर्णय लिया। अडोल्फ़ हिटलर उसी समय 1942 के अंत में बोस से मिले थे। और उन्होंने भी सुभाषचंद्र बोस को दक्षिणी एशिया जाने की सलाह दी और पनडुब्बी लेने की भी सलाह दी। बोस ने अच्छी तरह से एक्सिस ताकत को जान लिया था और खेदसूचक ढंग से वह ज्यादा देर तक नही टिक पाई।

फेब्रुअरी 1943 में सुभाषचंद्र बोस जर्मन पनडुब्बियों पर पहुचें। मैडागास्कर में, उन्हें जापानीज पनडुब्बी में स्थानांतरित किया गया। जहा मई 1943 में वे जापानीज स्थान सुमात्रा में उतरे।

जापानियों की सहायता से ही सुभाष चंद्र बोस – Subhash Chandra Bose ने इंडियन नेशनल आर्मी (INA) का पुनर्निर्माण किया। जिसमे ब्रिटिश इंडियन आर्मी के भारतीय सैनिक भी शामिल थे। जिन्होंने सिंगापुर युद्ध में महान कार्य किया था। इस तरह बोस के आने से मलैया और सिंगापुर में भारतीय नागरीकों की संख्या बढ़ने लगी।

सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में जापानीज भारतीय सरकार को विभिन्न क्षेत्रो में सहायता करने के लिये राजी हुए। जैसे की उन्होंने बर्मा की सहायता की थी। और साथ ही जैसा साथ उन्होंने फिलीपींस और मांचुकुओ का दिया था। उन्होंने भारत की अस्थाई सरकार, जिसे बोस प्रतिपादित कर रहे थे, की स्थापना जापानीयो के साथ मिलकर अंडमान और निकबर में की।

सुभाषचंद्र बोस अच्छी तरह से अपनी सेना का नेतृत्व कर रहे थे – उनमे काफी करिश्माई ताकत समायी थी। इसी के चलते उन्होंने प्रसिद्ध भारतीय नारे “जय हिन्द” की घोषणा की। और उसे अपनी आर्मी का नारा बनाया। उनकें नेतृत्व में निर्मित इंडियन नेशनल आर्मी एकता और समाजसेवा की भावना से बनी थी।

उनकी सेना में भेदभाव और धर्मभेद की जरा भी भावना नही थी। इसे देखते हुए जापानियों ने बोस को अकुशल सैनिक बताया। और इसी वजह से वे अपनी आर्मी को ज्यादा समय तक नही टिका पाये।

1944 के अंत में और 1945 के प्रारम्भ में ब्रिटिश इंडियन आर्मी पहले तो रुकी थी लेकिन बाद में उन्होंने पुनः भारत पर आक्रमण किया। जिसमे लगभग आधी जापानी शक्ति और इंडियन नेशनल आर्मी में शामिल आधे जापानी सैनिक मारे गए। बाद में इंडियन नेशनल आर्मी मलय पेनिनसुला गयी जहा सिंगापुर में उन्हें देखा गया था और उन्होंने स्वयं ही खुद को जापानियों के हवाले कर दिया था।

बोस ने पहले जापानियों के डर से आत्मसमपर्ण का निर्णय नही लिया था। बल्कि उन्होंने भागकर मंचूरिया जाने की बजाये सोवियत संघ के भविष्य के लिये आत्मसमर्पण करने की ठानी।

ताइवान में हुए विमान अपघात में उनकी मृत्यु हो गयी थी। लेकिन आज भी बहोत से भारतीयो को इस बात पर विश्वास नही की उनका विमान हादसा वास्तव में हुआ था भी या नही। उस समय हादसे के बाद भी भारतीय बंगाल प्रान्त के लोगो को भरोसा था की बोस भारत की आजादी के लिये दोबारा आएंगे।

रंगून के ‘जुबली हॉल’ में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया वह भाषण सदैव के लिए इतिहास के पत्रों में अंकित हो गया। जिसमें उन्होंने कहा था कि- “स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है। किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है।

आज़ादी को आज अपने शीश फूल चढ़ा देने वाले पागल पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है। जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता देवी को भेट चढ़ा सकें।

“तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”

इस वाक्य के जवाब में नौजवानों ने कहा – “हम अपना ख़ून देंगे” उन्होंने आईएनए को ‘दिल्ली चलो’ का नारा भी दिया। सुभाष भारतीयता की पहचान ही बन गए थे और भारतीय युवक आज भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। वे भारत की अमूल्य निधि थे। ‘जय हिन्द’ का नारा और अभिवादन उन्हीं की देन है।

सुभाष चंद्र बोस के ये घोषवाक्य आज भी हमें रोमांचित करते है। यही एक वाक्य सिद्ध करता है कि जिस व्यक्तित्व ने इसे देश हित में सबके सामने रखा वह किस जीवन का व्यक्ति होगा।

‘इंडियन नेशनल आर्मी’ के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु पर इतने वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी रहस्य छाया हुआ है। सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु हवाई दुर्घटना में मानी जाती है। समय गुजरने के साथ ही भारत में भी अधिकांश लोग ये मानते है कि नेताजी की मौत ताईपे में विमान हादसे में हुई।

कहा जाता है की 18 अगस्त 1945 को यह हादसा ताइवान में हुआ था। लेकिन फिर भी बहोत से लोगो को इस बात पर भरोसा नही था।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस सर्वकालिक नेता थे, जिनकी ज़रूरत कल थी। आज है और आने वाले कल में भी होगी। वह ऐसे वीर सैनिक थे, इतिहास जिनकी गाथा गाता रहेगा। उनके विचार, कर्म और आदर्श अपना कर राष्ट्र वह सब कुछ हासिल कर सकता है, जिसका वह हक़दार है। सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता समर के अमर सेनानी, मां भारती के सच्चे सपूत थे।

नेताजी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उन योद्धाओं में से एक थे। जिनका नाम और जीवन आज भी करोड़ों देशवासियों को मातृभमि के लिए समर्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है। उनमें नेतृत्व के चमत्कारिक गुण थे। जिनके बल पर उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान संभाल कर अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करने के लिए एक मज़बूत सशस्त्र प्रतिरोध खड़ा करने में सफलता हासिल की थी।

नेताजी के जीवन से यह भी सीखने को मिलता है कि हम देश सेवा से ही जन्मदायिनी मिट्टी का कर्ज़ उतार सकते हैं। उन्होंने अपने परिवार के बारे में न सोचकर पूरे देश के बारे में सोचा। नेताजी के जीवन के कई और पहलू हमे एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे एक सफल संगठनकर्ता थे।

उनकी बोलने की शैली में जादू था और उन्होंने देश से बाहर रहकर ‘स्वतंत्रता आंदोलन’ चलाया। नेताजी मतभेद होने के बावज़ूद भी अपने साथियो का मान सम्मान रखते थे। उनकी व्यापक सोच आज की राजनीति के लिए भी सोचनीय विषय है।

एक नजर में सुभाषचंद्र बोस का इतिहास / Netaji Subhash Chandra Bose History In Hindi

1) 1921 में सुभाषचंद्र बोस / Subhash Chandra Bose इन्होंने सरकारी नोकरी में बहोत उच्च स्थान का त्याग करके राष्ट्रीय स्वातंत्र के आंदोलन में कुद पडे। स्वातंत्र लढाई में हिस्सा लेने के लिये अपनी नौकरी का इस्तीफा देणे वाले वो पहले आय.सी.एस. अधिकारी थे।

2) 1924 में कोलकत्ता महानगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में उनको चित्तरंजन दास इन्होंने चुना। पर इसी स्थान होकर और कौनसा भी सबुत न होकर अंग्रेज सरकार ने क्रांतीकारोयों के साथ सबंध रखा ये इल्जाम लगाकर उन्हें गिरफ्तार मंडाले के जेल में भेजा गया।

3) 1927 में सुभाषचंद्र बोस और पंडित जवाहरलाल नेहरू इन दो युवा नेताओं को कॉंग्रेस के महासचिव के रूप में चुना गया। इस चुनाव के वजह से देशके युवाओं में बड़ी चेतना बढ़ी।

4) सुभाषचंद्र बोस इन्होंने समझौते के स्वातंत्र के अलावा पुरे स्वातंत्र की मांग कॉंग्रेस ने ब्रिटिशों से करनी चाहिये। ऐसा आग्रह किया। 1929 के लाहोर अधिवेशन में कॉंग्रेस ने पूरा स्वातंत्र का संकल्प पारित किया। ये संकल्प पारित होने में सुभाषचंद्र बोस इन्होंने बहोत प्रयास किये।

5) 1938 में सुभाषचंद्र बोस हरिपुरा कॉंग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष बने।

6) 1939 में त्रिपुरा यहा हुये कॉंग्रेस के अधिवेशन में वो गांधीजी के उमेदवार डॉ. पट्टाभि सीतारामय्या इनको घर दिलाकर चुनकर आये। पर गांधीजी के अनुयायी उनको सहकार्य नहीं करते थे। तब उन्होंने उस स्थान का इस्तीफा दिया और ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ ये नया पक्ष स्थापन किया।

7) इंग्लंड दुसरे महायुध्द में फसा हुवा है। इस स्थिति का लाभ लेकर स्वातंत्र के लिए भारत ने सशस्त्र लढाई करनी चाहिए’ ऐसा प्रचार वो करते थे। इस वजह से अंग्रेज सरकार का उनके उपर का गुस्सा बढ़ा।

सरकारने उन्हें जेल में डाला पर उनकी तबियत खराब होने के वजह से उन्हें घर पर ही नजर कैद में रखा। 15 जनवरी १९४१ में सुभाषबाबू भेस बदलकर अग्रेजोंके चंगुल से भाग गये। काबुल के रास्ते से जर्मनी की राजधानी बर्लिन यहा गये।

8) भारत के स्वातंत्र लढाई के लिये सुभाषबाबू ने हिटलर के साथ बातचीत की। जर्मनी में ‘आझाद हिंद रेडिओ केंद्र’ शुरु किया। इस केंद्र से अंग्रेज के विरोध में राष्ट्रव्यापी संकल्प करने का संदेश वो भारतीयोंको देने लगे।

9) जर्मनी में रहकर भारतीय स्वतंत्र के लिये हम कुछ महत्वपूर्ण रूप की कृति कर सकेंगे। ऐसा ध्यान में आतेही सुभाषचंद्र बोस जर्मनी से एक पनडुब्बी से जपान गये।

रासबिहारी बोस ये भारतीय क्रांतिकारी उस समय जपान में रहते थे। उन्होंने मलेशिया, सिंगापूर, म्यानमार आदी। पूर्व आशियायी देशों में के भारतीयोका ‘इंडियन इंडिपेंडेंट लीग‘ (हिंदी स्वातंत्र संघ) स्थापन किया हुवा था।

जपान इ हिंदी के हाथ में आये हुये अंग्रेजो के लष्कर में के हिंदी सैनिकोकी ‘आझाद हिंद सेना’ उन्होंने संघटित की थी। उसका नेतृत्व स्वीकार करने की सुभाषबाबू को रासबिहारी बोस ने उन्होंने आवेदन किया। नेताजीने वो आवेदन स्वीकार किया। इस तरह सुभाषचंद्र बोस आझाद हिंद सेने के सरसेनापती बने।

10) 1943 में अक्तुबर महीने में सुभाषबाबू के अध्यक्षता में ‘आझाद हिंद सरकार’ की स्थापना हुयी। अंदमान और निकोबार इन व्दिपो कब्जा कटके आझाद हिंद सरकार ने वहा तिरंगा लहरा दिया।

अंदमान को ‘शहीद व्दिप’ और निकोबार को ‘स्वराज्य व्दिप’ ऐसे नाम दिये। जगन्नाथराव भोसले, शहनवाझ खान, प्रेम कुमार सहगल, डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन आदी उनके पास के साथी थे। डॉ. लक्ष्मी स्वामी नाथन ये ‘झाशी की राणी’ पथक के प्रमुख थी।

‘तिरंगा झेंडा’ ये आझाद हिंद सेन का निशान ‘जयहिंद’ ये अभिवादन के शब्द, ‘चलो दिल्ली’ ये घोष वाक्य और ‘कदम कदम बढाये जा’ ये समरगित था। इसी सेना ने 1943 से 1945 तक शक्तिशाली अंग्रेजों से युध्द किया था तथा उन्हें भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर देने के विषय में सोचने को मजबूर किया।

11) जपान सरकार के निवेदन के अनुसार सुभाषचंद्र बोस एक विमान से टोकियो जाने के लिये निकले उस विमान को फोर्मोसा मतलब ताइहोकू व्दिप के हवाई अड्डे के पास दुर्घटना हुयी। इस दुर्घटना में 18 अगस्त 1945 को नैताजी की मृत्यु हो गयी।

बचपन से ही सुभाष में राष्ट्रीयता के लक्षण प्रकट होने लगे थे और निस्वार्थ सेवा भावना उनके चरित्र की विशेषता थी। इन सभी उदात्त प्रवुत्तियों से ही उनके क्रांतिकारी पर उदार व्यक्तित्व का निर्माण हुआ था।

Subhash Chandra Bose More Articles:

पुरस्कार: Subhash Chandra Bose awards:

भारत सरकार ने 1992 में सुभाषबाबू को ‘भारतरत्न’ ये सर्वोच्च सम्मान की घोषणा की गयी लेकिन बोस परिवार वालोने वो स्वीकार करने से इन्कार कर दिया।

मृत्यु -Subhash Chandra Bose Died:

18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में सुभाषबाबू की मौत हुयी।

Subhash Chandra Bose भारतीयता की पहचान ही बन गए थे और भारतीय युवक आज भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते है। वे भारत की अमूल्य निधि थे। ‘जयहिन्द’ का नारा और अभिवादन उन्ही की देंन है। उनकी प्रसिध्द पंक्तियाँ है – “तुम मुझे खून दो, मै तुम्हेँ आजादी दूंगा।”

Books:

जरुर देखे नेताजी सुभाषचंद्र बोस को समर्पित एक विडियो:

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Give me blood and I shall give you freedom!

देश की आजादी में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले अनेक महापुरुष हुए हैं। ऐसी ही महान विभूतियों में से एक थे सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गाँधी ने नेताजी को देशभक्तों का देशभक्त कहा था।

सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। सुभाष का ताल्लुक एक कुलीन परिवार से था, उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे।

स्वामी विवेकानंद को अपना आर्दश मानने वाले सुभाष चन्द्र बोस जब भारत आए तो रविन्द्रनाथ टैगोर के कहने पर सबसे पहले गाँधी जी से मिले थे । गाँधी जी से पहली मुलाकात मुम्बई में 20 जुलाई 1921 को हुई थी। गाँधी जी की सलाह पर सुभाष कोलकता में दासबाबू के साथ मिलकर आजादी के लिये प्रयास करने लगे। जब दासबाबू कोलकता के महापौर थे, तब उन्होने सुभाष चन्द्र बोस को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बनाया था। अपने कार्यकाल के दौरान सुभाष बाबु ने कोलकता के रास्तों का अंग्रेजी नाम बदलकर भारतीय नाम कर दिया था ।

संभ्रात परिवार के होने के बावजूद भी उनका झुकाव सांसारिक धन, वैभव या पदवी की ओर नही था। मित्रगणं उन्हे सन्यासी पुकारते थे। सुभाष चन्द्र बोस को उनके घर वाले विलायत पढने के लिये इस आशा से भेज था कि सुभाष आई. सी. एस. की उच्च परिक्षा पास करके बङी सरकारी नौकरी करेंगे और परिवार की समृद्धि एवं यश की रक्षा करेंगे किन्तु जिस समय वे विलायत में थे, उसी समय अंग्रेजी सरकार के अन्यायपूर्ण नियमों के विरुद्ध गाँधी जी ने सत्याग्रह संग्राम छेङ हुआ था। सरकार के साथ असहयोग करके उसका संचालन कठिन बनाना, इस संग्राम की अपील थी। गाँधी जी से प्रभावित होकर सुभाष अपनी प्रतिष्ठित नौकरी छोङकर असहयोग आंदोलन में शामिल हो गये। आई. सी. एस. की परिक्षा पास करके भी सरकारी नौकरी छोङ देने वाले सबसे पहले व्यक्ति सुभाष चन्द्र बोस थे। अनेक इष्ट-मित्रों ने और स्वयं ब्रिटिश सरकार के भारत मंत्री ने उनको ऐसा न करने के लिये बहुत समझाया , किन्तु कलेक्टर और कमिश्नर बनने के बजाय सुभाष चन्द्र बोस को मातृ भूमि का सेवक बनना ज्यादा श्रेष्ठ लगा।

बंगाल के श्रेष्ठ नेता चितरंजन दास गाँधी जी के आह्वान पर अपनी लाखों की बैरस्टरी का मातृ भूमि के लिये त्याग कर चुके थे। सुभाष बाबु के त्याग को सुनकर उन्हे बहुत खुशी हुई। चितरंजन दास देशबन्धु के त्याग से सुभाष भी बहुत प्रभावित हुए थे। सुभाष बाबु देशबन्धु को अपना राजनीतिक गुरू मानते थे और उनके प्रति अत्यंत आदर और श्रद्धा का भाव रखते थे।

सुभाष चन्द्र बोस के ओजस्वी भाषणों से हजारों विद्यार्थी, वकील, सरकारी नौकर गाँधी जी के आंदोलन में शामिल हो गये । सुभाष बाबु के तेज प्रवाह से डर कर अंग्रेज सरकार ने चितरंजन दास और सुभाष को 6 महिने कैद की सजा सुनाई।
सुभाष, भारत माँ की आजादी के साथ ही अनेक सामाजिक कार्यों में दिल से जुङे थे। बंगाल की भयंकर बांढ में घिरे लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाना, उनके लिये भोजन वस्त्र आदि का प्रबंध स्वयं करते थे। उनके परिश्रम को देखकर सरकारी अघिकारी भी प्रशंसा किये बिना न रह सके। समाज-सेवा का कार्य नियमित रूप से चलता रहे इसलिये उन्होने “युवक-दल” की स्थापना की थी। कुछ समय पश्चात युवक दल ने किसानों के हित में कार्य आरंभ किया जिसका लक्ष्य, किसानो को उनका हक दिलाना था।

सुभाष बाबु के प्रभाव से अंग्रेजी सरकार भयभीत हो गई । अंग्रेजों ने उन पर आरोप लगाया कि वे बम और पिस्तौल बनाने वाले क्रांतिकारियों के साथ हैं। उन्हे कुछ दिन कोलकता की जेल में रखने के बाद मांडले(वर्मा) की जेल में भेज दिया गया, जहाँ लगभग 16, 17 वर्ष पहले लाला लाजपत को एवं लोकमान्य बाल गंगाधर को रखा गया । अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाष बाबू को कुल ग्यारह बार कारावास हुआ था। राजनीतिक प्रेरणास्रोत देशबन्धु चितरंजन दास के निधन का समाचार, सुभाष बाबु को मांडले जेल मे मिला, ये उनके लिये बहुत ही दुखःदायी समाचार था। 11 महिने की कारावास में उनको इतनी तकलीफ नही हुई थी, जितनी इस खबर से हुई। देशबंधु चितरंजन दास की कही बात “बंगाल के जल, बंगाल की मिट्टी, में एक चितरंजन सत्य निहित है।“ से सुभाष चन्द्र बोस को कोलकता से दूरी का एहसास होने लगा था। फिर भी जेल में रहने का उनको दुःख नही था, उनका मानना था कि भारत माता के लिये कष्ट सहना गौरव की बात है। मांडले जेल में अधिक बीमार हो जाने के कारण सरकार ने उनको छोङने का हुक्म दे दिया।

कोलकता में वापस भारत की आजादी के लिये कार्य करने लगे। इसी दौरान क्रांतिकारी नेता यतींद्रनाथ ने लाहौर जेल में 63 दिन के भूख हङताल करके प्राण त्याग दिये । शहीद यतींद्रनाथ की शव यात्रा को पूरे जोश के साथ निकाला गया । इस अवसर पर सुभाष बाबु अंग्रेजों को खिलाफ बहुत ही जोशिला भांषण दिया , जिस वजह से उनको पुनः गिरफ्तार कर लिया गया।

इस प्रकार जब कई बार जेल भेज कर सरकार थक गई तो उनको नजरबंद कर दिया गया। इस हालत में सुभाष बाबु का स्वास्थ पुनः खराब हो गया। जेल से रिहा करने के बजाय उनको इलाज के लिये स्वीट्जरलैंड भेज दिया गया। विदेश में रह कर भी देश की स्वाधीनता के लिये कार्य करते रहे।
पिता की बिमारी की खबर मिलने पर सरकार के मना करने पर भी भारत आये लेकिन जहाज से उतरते ही उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया और इस शर्त पर छोङे गये कि जब तक भारत में रहेंगे किसी राजनीतिक गतिविधी में भाग नही लेंगे। पिता के अंतिम क्रियाकर्मों के बाद उन्हे विदेश वापस जाना पङा।

दो वर्ष बाद वापस भारत आये किन्तु पुनः पकङ लिये गये और जब सभी प्रान्तों में कांग्रेसी सरकार बन गई तब जेल से रिहा हो पाये। 1938 में कांग्रेस के सभापति बनाये गये। रविन्द्रनाथ टैगोर, प्रफुलचन्द्र राय, मेधनाद साह जैसे वैज्ञानिक भी सुभाष की कार्यशैली के साथ थे। 1938 में गाँधी जी ने कांग्रेस अध्यक्षपद के लिए सुभाष को चुना तो था, मगर गाँधी जी को सुभाष बाबू की कार्यपद्धती पसंद नहीं आयी। इसी दौरान युरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल छा गए । सुभाष बाबू चाहते थे कि इंग्लैंड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर, भारत का स्वतंत्रता संग्राम अधिक तेज कर दिया जाए। उन्होने अपने अध्यक्षपद के कार्यकाल में इस तरफ कदम उठाना भी शुरू कर दिया था। गाँधी जी इस विचारधारा से सहमत नहीं थे।भगत सिहं को फासी से न बचा पाने पर भी सुभाष, गाँधी जी एवं कांग्रेस से नाखुश थे। इन मतभेदों के कारण आखिरकार सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस पार्टी छोङ दी ।

1940 में रामगढ कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर सुभाष बाबू ने “समझौता विरोधी कॉनफ्रेस” का आयोजन किया और उसमें बहुत जोशीला भांषण दिया । “ब्लैक-हॉल” स्मारक को देश के लिये अपमानजनक बतला कर उसके विरुद्ध आन्दोलन छेङ दिये। इससे अंग्रेज सरकार ने उन्हे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जहाँ उन्होने भूख हङताल कर दी आखिर अंग्रेजों को उन्हे छोङना पङा और उनकी माँग के आगे झुकना पङा, जिससे “ब्लैक-हॉल स्मारक” को हटाना स्वीकार किया गया।

सन् 1941 में जब कोलकता की अदालत में मुकदमा पेश होना था, तो पता चला कि वह घर छोङ कर कहीं चले गये हैं । दरअसल सुभाष बाबु वेष बदल कर पहरेदारों के सामने से ही निकल गये थे। भारत छोङकर वह सबसे पहले काबुल गये तद्पश्चात जर्मनी में हिटलर से मिले। उन्होने जर्मनी में “भारतीय स्वतंत्रता संगठन” और “आजाद हिंद रेडिओ” की स्थापना की थी। जर्मनी से गोताखोर नाव द्वारा जापान पहुँचे। । अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया और युवाओं का आह्वान करते हुए कहा “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा।”

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आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतो के लिए झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी। अपनी फौज को प्रेरित करने के लिए नेताजी ने “चलो दिल्ली” का नारा दिया। सैनिकों का हौसला बुलंद करने के लिये, उनके द्वारा दिया गया “जय हिन्द” का नारा, भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया ।

दोनो फौजो ने अंग्रेजों से अंडमान और निकोबार द्वीप जीत लिए। यह द्वीप अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद के अनुशासन में रहें। नेताजी ने इन द्वीपों का शहीद और स्वराज द्वीप नाम से नामकरण किया । दोनो फौजो ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया। लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलडा भारी पडा और दोनो फौजो को पीछे हटना पडा। सुभाष चन्द्र बोस आजादी के लिये निरंतर प्रयास करते रहे। 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद, नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी हो गया । उन्होने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया।

अतः 18 अगस्त 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मांचुरिया की तरफ जा रहे थे। इस सफर के दौरान वे लापता हो गए। इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखाई नहीं दिये। नेताजी कहाँ लापता हो गए और उनका आगे क्या हुआ, यह भारत के इतिहास का सबसे बडा अनुत्तरित रहस्य हैं।

इस प्रकार देश के महान आत्म बलिदानी के जीवन का अंत असमय हो गया। अल्प समय में भारतीयों के मानस पटल पर एक अमिट छाप छोङ गये। सुभाष चन्द्र बोस ने 18 वर्ष की आयु में अपने पिता से कहा था कि- “विवेकानंद का आदर्श ही मेरा आदर्श है।”

स्वाधीनता के पुजारी सुभाष चन्द्र बोस ने भारत माता की आजादी के लिये अपना सर्वस्व , अपार योग्यता और कार्यशक्ति मातृभूमि के चरणों में अर्पित कर दिया । त्याग और बलिदान की इस प्रतिमूर्ति को कोटी-कोटी प्रणाम।

जय हिन्द, जय भारत

अनिता शर्मा
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अनिता जी दृष्टिबाधित लोगों की सेवा में तत्पर हैं। उनके बारे में अधिक जानने के लिए पढ़ें – नेत्रहीन लोगों के जीवन में प्रकाश बिखेरती अनिता शर्मा और  उनसे जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

———सुभाष चन्द्र बोस के अनमोल विचार ———-

Once again thanks a lot Anita ji for sharing this excellent write-up on the life of Subhash Chandra Bose and inspiring us with your great social work.

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Filed Under: Hindi Essay, हिंदी निबंधTagged With: Anita Sharma, Subhash Chandra Bose

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